Wednesday, January 30, 2019

जॉर्ज फ़र्नांडिस के सियासी ख़ात्मे के लिए कौन था ज़िम्मेदार: नज़रिया

बिहार के एक अज़ीम शायर कलीम आजिज़ का यह शेर सियासत में कहाँ किन पर फ़िट बैठ रहा है, लोग यह समझ ही जाते हैं.

एक मुशायरे में इस शेर पर शायर को दाद देने वालों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी शामिल देख अनायास ही मुझे जॉर्ज फ़र्नांडिस याद आ गए थे.

जॉर्ज जैसे धुरंधर लीडर के राजनीतिक जीवनकाल का आख़री अध्याय किस नेता की वजह से एक दर्दनाक दौर बन कर रह गया, यह कौन नहीं जानता ?

यहाँ आप को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के जीवित शिखर पुरुष लालकृष्ण आडवाणी भी याद आ जाएँ तो इसे स्वाभाविक ही कहा जाएगा.

वर्ष 1994 में बिहार से उभरे एक सियासी मंच (समता पार्टी) पर जॉर्ज-नीतीश का जो 'मशाल छाप' रिश्ता बना था, वह वर्ष 2009 के आते-आते 'तीर छाप' चुभन का शिकार हो गया.

चाहे जॉर्ज फ़र्नांडिस की अध्यक्षता वाली तत्कालीन समता पार्टी हो, या उसके विलय के बाद शरद यादव की अध्यक्षता वाला जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू), दोनों के असली सूत्रधार तो नीतीश कुमार ही रहे हैं.

इसलिए जब राज्य की सत्ता और अपनी पार्टी पर मज़बूत पकड़ वाला बल नीतीश कुमार में बढ़ने लगा था, तब वह अपनी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कुछ भी और किसी को भी क़बूल नहीं करने के मोड में दिखने लगे थे.

यही वह दौर था, जब उन्होंने जॉर्ज जैसे ऊँचे सियासी क़द वाले अपने गुरु (मेंटॉर) को भी हाशिए पर खिसकाने की सोच ली और अपनी इस चाहत में वो कामयाब भी हो गए.

दरअसल दोनों नेताओं के रिश्ते में दरार का पहला निशान वर्ष 2005 में ही दिख गया था.

लालकृष्ण आडवाणी ने उस वर्ष होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव से कई माह पूर्व ही नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद के लिए एनडीए का प्रत्याशी घोषित कर दिया था.

उस समय जेडीयू के एक बड़े नेता दिग्विजय सिंह ने इसका विरोध ये कहते हुए किया था कि इस बाबत एनडीए में जॉर्ज या अन्य किसी नेता से राय-मशवरा किये बिना आडवाणी जी को निजी तौर पर ऐसी घोषणा नहीं करनी चाहिए थी.

फिर तो जॉर्ज फ़र्नाडिस ने भी इस प्रसंग में छिड़ी चर्चा पर ये कह दिया कि मुख्यमंत्री का चुनाव पार्टी के निर्वाचित विधायकों की बैठक में हो, यही मुनासिब है.

बस यहीं से बात बिगड़नी शुरू हो गयी. माना जाता है कि इसी के बाद जेडीयू के राष्ट्रीय नेतृत्व वाले ओहदे से जॉर्ज को दरकिनार कर के शरद यादव को इस बाबत अधिक तरजीह देने वाली रणनीति पर अमल होने लगा.

कहा यह भी जाता है कि नीतीश कुमार के दिल में इस कारण चुभा शूल तभी निकला, जब उन्होंने पहले बाँका से दिग्विजय सिंह को और बाद में मुज़फ़्फ़रपुर से जॉर्ज फ़र्नाडिस को लोकसभा चुनाव (2009) में जेडीयू का उम्मीदवार बनने नहीं दिया.

चूँकि पार्टी की ज़मीनी ताक़त नीतीश कुमार में निहित थी, इसलिए जॉर्ज से छुट्टी पा लेने जैसा बड़ा क़दम उठाने में किसी बड़ी रुकावट का उन्हें ख़तरा भी नहीं था.

लेकिन हाँ, राजनीति में नीतीश जिन्हें अपना अभिभावक, प्रेरक और मार्गदर्शक बताते नहीं थकते थे/हैं, उन्हीं को ख़राब स्वास्थ्य के बहाने पार्टी के चुनावी टिकट से वंचित कर देना नीतीश पर 'करामाती क़ातिल'-सा इशारा दे ही गया.

वैसे, इतनी खुली बात पर और खुल कर या विस्तार से क्या बोलना? यह मौक़ा ऐसा है भी नहीं. अच्छा है कि जॉर्ज फ़र्नांडीस के देहावसान पर भावुक हुए नीतीश के अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि वाले मार्मिक बोल ही मीडिया में मुखर हो रहे हैं.

Tuesday, January 22, 2019

बाल ठाकरे कहते थे 'कमलाबाई (बीजेपी) वही करेगी जो मैं कहूंगा': विवेचना

बात 1995 की है. मुंबई में हुए सांप्रदायिक दंगों के काफ़ी दिनों बाद मणि रत्नम ने इस पर एक फ़िल्म बनाई थी जिसका नाम रख गया था, 'बॉम्बे.'

इस फ़िल्म में शिव सैनिकों को मुसलमानों को मारते और लूटते हुए दिखाया गया था. फ़िल्म के अंत में बाल ठाकरे से मिलता जुलता एक चरित्र इस हिंसा पर अपना दुख प्रकट करता दिखाई देता है. उसके साथ एक मुस्लिम नेता भी इसी तरह के विचार प्रकट करता है.

ठाकरे ने इस फ़िल्म के प्रदर्शन का विरोध किया और कहा कि वो उसे मुंबई में प्रदर्शित नहीं होने देंगे.

इस फ़िल्म के वितरक अमिताभ बच्चन ठाकरे के दोस्त थे. वो उनके पास गए और पूछा क्या शिव सैनिकों को दंगाइयों के रूप में दिखाना उन्हें बुरा लगा?

ठाकरे ने जवाब दिया, "बिल्कुल भी नहीं. मुझे जो चीज़ बुरी लगी वो था दंगों पर ठाकरे के चरित्र का दुख प्रकट करना. मैं कभी किसी चीज़ पर दुख नहीं प्रकट करता."

अपने चालीस साल से भी अधिक के राजनीतिक जीवन में कोई ऐसा विषय नहीं हुआ करता था, जिस पर ठाकरे की राय नहीं हुआ करती थी. चाहे राष्ट्रीय राजनीति हो या कला या खेल या कोई और भी विषय, बाल ठाकरे उस पर टिप्पणी करने से परहेज़ नहीं करते थे.

उनके शब्दों में अक्सर दूसरों के लिए परिहास होता था या नाक़ाबिले-बर्दाश्त तीखापन. ठाकरे के पास लोगों की परेशानी से जुड़े क़िस्सों का भंडार था.

मशहूर पत्रकार वीर साँघवी बताते हैं, "वो अक्सर एक कहानी सुनाया करते थे. एक बार रजनी पटेल की पार्टी में महाराष्ट्र के तत्कालीन क़ानून मंत्री शराब के नशे में इतने धुत हो गए कि ठाकरे ने उन्हें अपनी कार में उनके घर छोड़ने की पेशकश की. लेकिन तब तक मंत्री का अपने ऊपर नियंत्रण पूरी तरह से समाप्त हो चुका था."

"ठाकरे की कार में ही उनका पेशाब निकल गया. ठाकरे बहुत मज़े लेकर वो क़िस्सा सुनाते थे कि उनको अपनी कार से पेशाब की बदबू निकालने में महीनों लग गए. कुछ दिनों बाद वही मंत्री ओबरॉय होटल की एक पार्टी में फिर नशे में आ गए. ठाकरे ने उन्हें इस बार लिफ़्ट देने से साफ़ इंकार कर दिया."

बाल ठाकरे की जीवनी 'हिंदू हृदय सम्राट- हाऊ द शिवसेना चेंज्ड मुंबई फ़ॉर एवर' लिखने वाली सुजाता आनंदन बताती हैं, "ठाकरे के पिता केशव ठाकरे 'वेनिटी फ़ेयर' पुस्तक के अंग्रेज़ी लेखक विलियम मेकपीस ठेकरे के मुरीद हुआ करते थे. उन्होंने उनसे प्रेरणा लेकर अपना पारिवारिक नाम ठैकरे रख लिया जो बाद में बदलकर ठाकरे हो गया."

उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 'फ़्री प्रेस जर्नल' में एक कार्टूनिस्ट के तौर पर की थी, जहाँ मशहूर कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण भी उनके साथ काम किया करते थे.

दिलचस्प बात ये है कि सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी ने दो दशकों तक बाल ठाकरे का पीछे से समर्थन किया. शुरुआती दिनों में कांग्रेस ने कम्युनिस्ट आंदोलन को तोड़ने में उनकी मदद ली, बाद में उनका इस्तेमाल कांग्रेस की अंदुरूनी लड़ाइयों में हिसाब चुकता करने के लिए किया जाने लगा.

सुजाता आनंदन बताती हैं, "उन दिनों मज़ाक में शिवसेना को महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री वसंतराव नायक और वसंतदादा पाटिल के नाम पर वसंत सेना कहा जाता था."

"ये एक संयोग नहीं था कि 2007 के राष्ट्रपति चुनाव में शिव सेना ने वर्षों से अपने सहयोगी रही भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार की जगह कांग्रेस की प्रतिभा पाटिल का समर्थन करने का फ़ैसला लिया था. वर्ष 2012 में भी कांग्रेस के बिना कहे वो कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी के समर्थन में उतर आए थे."

Thursday, January 10, 2019

शाह फ़ैसल का इस्तीफ़ा, केंद्रीय मंत्री ने कहा 'आतंकवादी को आतंकवादी' कहने से कतराते हैं

जम्मू-कश्मीर से साल 2009 में सिविल सेवा परीक्षा टॉप करने वाले आईएएस अधिकारी शाह फ़ैसल ने बुधवार को अपने पद से इस्तीफ़ा देने का ऐलान किया. उन्होंने कश्मीर में हिंसा के कारण हो रही हत्याओं के विरोध में ये इस्तीफ़ा दिया. इसपर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आनी तेज़ हो गई है.

आईएएस अधिकारी ने इस इस्तीफ़े पर कैबिनेट मंत्री जितेंद्र सिंह ने समाचार एजेंसी एएनआई से प्रतिक्रिया देते हुए कहा है, '' ये अपने आप में दृढ़ विश्वास की कमी का संकेत है. अगर आपमें दृढ़ विश्वास होता तो आपको आतंकवाद की निंदा करने के लिए तैयार रहना चाहिए था.''

''एक तरफ़ आप हमले के खिलाफ़ सुरक्षा का फ़ायदा देते हैं तो दूसरी ओर आप आंतकवादी को आतंकवादी कहने से कतराते हैं.''

जितेंद्र सिंह के बयान का ट्विटर पर जवाब देते हुए नेशनल कांफ़्रेंस नेता उमर अब्दुल्ला ने लिखा, ''फ़ैसल के पिता डॉक्टर साहिब शाह की हत्या चरमपंथियों ने की थी. लेकिन मुझे उम्मीद है कि आप बोलने से पहले ख़ुद को इस बात से अवगत कराने की ज़हमत नहीं उठाते. शाह फ़ैसल से बेहतर हिंसा और चरमपंथ का दर्द कोई नहीं समझ सकता है. ''

शाह फ़ैसल के इस्तीफ़े पर वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने भी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा, ''उनका कहा एक-एक शब्द मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा करता है.''

चिदंबरम ने इस बारे में कई ट्वीट किए जिनमें उन्होंने कहा, "अफ़सोस, लेकिन मैं शाह फ़ैसल को सलाम करता हूं. उनके बयान का हर शब्द सही है और भाजपा सरकार पर कलंक है. दुनिया उनके आक्रोश, पीड़ा और चुनौती को याद रखेगी."

उन्होंने एक और ट्वीट में लिखा, "ज्यादा समय पहले की बात नहीं है जब पुलिस अधिकारी श्री रिबेरो ने इसी तरह की बात कही थी, लेकिन सत्ता में बैठे लोगों के मुंह से आश्वासन का एक शब्द भी नहीं निकला. हमारे साथी नागरिकों के इस तरह के बयानों से हमें अपना सिर शर्म और पछतावे में झुका लेना चाहिए."

बुधवार को शाह फ़ैसल ने अपने ट्विटर अकाउंट से ट्वीट किया था, '' कश्मीर में बेरोक हत्याओं और केंद्र सरकार से किसी भी विश्वसनीय राजनीतिक पहल के अभाव में, मैंने आईएएस पद से इस्तीफ़ा देने का फैसला किया है. कश्मीरियों की ज़िंदगी मायने रखती है. ''

शाह फ़ैसल राजनीति में रखेंगे कदम

अपने इस्तीफ़े पर शाह फ़ैसल ने श्रीनगर में बीबीसी संवाददाता रियाज़ मसरूर से विस्तार से बातचीत की और इस बात के संकेत दिए कि वे राजनीति में क़दम रखने की योजना बना रहे हैं.

''मैंने कभी नहीं कहा कि नौकरी नहीं छोड़ सकता. मेरे लिए हमेशा नौकरी एक इंस्ट्रूमेंट था, लोगों की ख़िदमत करने का. अवाम की ख़िदमत कई तरीक़ों से हो सकती है, जो भी पब्लिक सर्विस में होते हैं, वो सब लोगों की ख़िदमत करते हैं. पिछले साल-दो साल से हमने जिस तरह से मुल्क में हालात देखे, जम्मू-कश्मीर में देखे. कश्मीर में हत्याओं का एक सिलसिला देखने को मिला.''

''हिंदू-मुस्लिम के बीच बढ़ते अंतर को देखा. रोंगटे खड़े करने वाले वीडियो हमने देखे. गौरक्षा के नाम पर उपद्रव देखने को मिला. ये तो कभी देखने को नहीं मिला था. अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश की कोशिशें हमने देखीं. ''

''अभी ये तय नहीं है कि किस पार्टी से जुड़ूँगा. हर पार्टी की अपनी लीगेसी है. अगर कभी पॉलिटिक्स में गया तो उस पार्टी से जुड़ूँगा जो मुझे राज्य के इस मौजूदा हालात पर खुलकर बात करने की आज़ादी देगी. ''

''मैं ऐसी पार्टी का हिस्सा बनना चाहूँगा जिसमें मुझे अल्पसंख्यकों के साथ, कश्मीरियों के साथ हो रही राजनीति को लेकर खुलकर बात करने का मौक़ा मिले. मैं अपने विकल्पों के बारे में सोच रहा हूं और जल्द ही इसपर फ़ैसला करूंगा.''

''मेरे लिए रीजनल पार्टी में जाना ज़्यादा सही होगा. मैं कश्मीर की बात करना चाहता हूं. हमें समझना होगा कि संसद की मुहर के बिना कोई भी तब्दीली नहीं की जा सकती. मैं संसद में कश्मीरियों की आवाज़ बनना चाहता हूं.''

''कई लोग मुझसे कह रहे हैं कि नई पार्टी बनानी चाहिए लेकिन मुझे लगता है कि अभी राज्य को एकता की ज़रूरत है. जितनी ज़्यादा पार्टियां बनेंगी उतना ही ज़्यादा जनमत विभाजित होगा.''

Friday, January 4, 2019

लेडी चैटर्ली की कहानी जिसके करोड़ों दीवाने रहे

कॉलेज के दिनों में बहुत से युवाओं ने लेडी चैटरली का क़िस्सा पढ़ा होगा. ज़मींदार परिवार की महिला के एक कामगार से जिस्मानी ताल्लुक़ात को डी एच लॉरेंस ने अपने उपन्यास 'लेडी चैटरलीज़ लवर' में विस्तार से बयां किया था.

लेडी चैटरली की कामुकता के बहुत से युवा दीवाने बन गए थे. उन्हें लगता था कि लॉरेंस के उपन्यास का ये किरदार हक़ीक़त में उनकी ज़िंदगी में आ जाए तो क्या लुत्फ़ हो.

अल्हड़, मदमस्त, कामुक लेडी चैटरली ने दुनिया भर में करोड़ों लोगों को अपना दीवाना बना लिया था.

पर, लेडी चैटरली के क़िस्से के रसिक करोड़ों लोगों में बहुत कम ही लोगों को मालूम होगा कि डीएच लॉरेंस के उपन्यास का वो किरदार कोई गढ़ा हुआ नहीं था. वो किरदार एक कल्पना भर नहीं, जीती-जागती महिला थी, जो लॉरेंस की ज़िंदगी पर गहरा असर छोड़ गई थी.

उस महिला का नाम था फ्रीदा वॉन रिचथोफ़ेन. हाल ही में मशहूर ब्रिटिश लेखिका एनाबेल एब्स ने फ्रीदा वॉन रिचथोफ़ेन की ज़िंदगी पर नई रोशनी डालने वाली किताब लिखी है, जिसका नाम है फ्रीदा.

फ्रीदा की ज़िंदगी के बारे में बहुत कम लोगों को पता है. वो डीएच लॉरेंस की प्रेमिका थी, प्रेरणा थी और हमराज़ भी थी.

अंग्रेज़ी का शब्द म्यूज़ (muse) उस शख़्स के लिए इस्तेमाल होता है, जो किसी कलाकार को कुछ नया रचने-गढ़ने के लिए प्रेरित करे. दुनिया में बहुत से ऐसे लोग हुए हैं, जिन्होंने कलाकारों को एक से एक कृतियां रचने की प्रेरणा दी है.

डीएच लॉरेंस की ज़िंदगी में आई फ्रीदा ने भी लॉरेंस को लेडी चैटरली जैसा किरदार गढ़ने की प्रेरणा दी और लॉरेंस को अमर बना दिया.

ख़ुद फ्रीदा की ज़िंदगी कैसी थी? क्या वो वाक़ई लेडी चैटरली जैसी कामुक और उन्मुक्त महिला थी?

फ्रीदा की ज़िंदगी पर नज़र डालें, तो आप को कहानी एकदम अलग ही नज़र आएगी. वो ख़ुद भले ही लॉरेंस की साहित्यिक कृतियों में दर्ज बहुत सी महिला किरदारों की प्रेरणा रही. पर, फ्रीदा की अपनी ज़िंदगी की हक़ीक़त एकदम अलग थी.

फ्रीदा वॉन रिचथोफ़ेन, डीएच लॉरेंस की प्रेमिका थी, हमराज़ थी, मॉडल थी और 'पंचिंग बैग' भी.

फ्रीदा, गुरबत के शिकार हो चुके एक जर्मन सामंत की बेटी थी. घुमक्कड़ मिज़ाज की फ्रीदा को जोखिम भरे काम करने में लुत्फ़ आता था. वो बौद्धिक प्रेरणा के लिए कसमसाती थी. पर, उस वक़्त के यूरोपीय समाज में महिलाओं को बराबरी का दर्ज़ा हासिल नहीं था.

ग़रीब बाप के घर की पाबंदियों से आज़ादी का एक ही रास्ता फ्रीदा के पास था और वो था शादी. 1899 में फ्रीदा ने केवल बीस बरस की उम्र में ब्रिटिश भाषा वैज्ञानिक अर्नेस्ट वीकले से ब्याह रचा लिया. शादी के बाद फ्रीदा जर्मनी से इंग्लैंड के नॉटिंघम शहर रहने के लिए आ गई. उस वक़्त नॉटिंघम एक औद्योगिक शहर हुआ करता था, जहां कारखानों का शोर भी था और प्रदूषण भी.

फ्रीदा ने जिस उम्मीद से शादी की थी, वो जल्द ही टूट गई. पति अर्नेस्ट वीकली को जवां बीवी से ज़्यादा काल्पनिक शब्दों में दिलचस्पी थी. फ्रीदा एक बार फिर से तन्हा थी. उसके साथ थी उसकी ख़्वाहिशें और खीझ. एक तरफ़ पति अर्नेस्ट अपनी किताब लिखने में व्यस्त, तो दूसरी तरफ़ फ्रीदा अपने तीन बच्चों को पालने में मसरूफ़.

जब पहला बच्चा सात बरस का हो गया, तो एक बार फिर फ्रीदा को अपने भीतर अजीब सी कुलबुलाहट, एक सख़्त क़िस्म की बेचैनी महसूस हुई. उसे लगा कि वो जाने क्या-क्या हो सकती थी, कर सकती थी. मगर, वो तो घरेलू ज़िम्मेदारियों की क़ैदी बन गई थी.

फ्रीदा की इस उलझन को उसकी शोख बहन एल्स वॉन रिचथोफ़ेन ने दूर किया. बहन ने फ्रीदा को नाजायज़ ताल्लुक़ात बनाने की सलाह दे डाली. फ्रीदा के मनोवैज्ञानिक ओटो ग्रॉस से अवैध संबंध बन गए. ग्रॉस, फ्रीदा का आशिक़ बन गया. पर, इस रिश्ते से भी फ्रीदा की बेचैनी दूर नहीं हुई.