कॉलेज के दिनों में बहुत से युवाओं ने लेडी चैटरली का क़िस्सा पढ़ा होगा. ज़मींदार परिवार की महिला के एक कामगार से जिस्मानी ताल्लुक़ात को डी एच लॉरेंस ने अपने उपन्यास 'लेडी चैटरलीज़ लवर' में विस्तार से बयां किया था.
लेडी चैटरली की कामुकता के बहुत से युवा दीवाने बन गए थे. उन्हें लगता था कि लॉरेंस के उपन्यास का ये किरदार हक़ीक़त में उनकी ज़िंदगी में आ जाए तो क्या लुत्फ़ हो.
अल्हड़, मदमस्त, कामुक लेडी चैटरली ने दुनिया भर में करोड़ों लोगों को अपना दीवाना बना लिया था.
पर, लेडी चैटरली के क़िस्से के रसिक करोड़ों लोगों में बहुत कम ही लोगों को मालूम होगा कि डीएच लॉरेंस के उपन्यास का वो किरदार कोई गढ़ा हुआ नहीं था. वो किरदार एक कल्पना भर नहीं, जीती-जागती महिला थी, जो लॉरेंस की ज़िंदगी पर गहरा असर छोड़ गई थी.
उस महिला का नाम था फ्रीदा वॉन रिचथोफ़ेन. हाल ही में मशहूर ब्रिटिश लेखिका एनाबेल एब्स ने फ्रीदा वॉन रिचथोफ़ेन की ज़िंदगी पर नई रोशनी डालने वाली किताब लिखी है, जिसका नाम है फ्रीदा.
फ्रीदा की ज़िंदगी के बारे में बहुत कम लोगों को पता है. वो डीएच लॉरेंस की प्रेमिका थी, प्रेरणा थी और हमराज़ भी थी.
अंग्रेज़ी का शब्द म्यूज़ (muse) उस शख़्स के लिए इस्तेमाल होता है, जो किसी कलाकार को कुछ नया रचने-गढ़ने के लिए प्रेरित करे. दुनिया में बहुत से ऐसे लोग हुए हैं, जिन्होंने कलाकारों को एक से एक कृतियां रचने की प्रेरणा दी है.
डीएच लॉरेंस की ज़िंदगी में आई फ्रीदा ने भी लॉरेंस को लेडी चैटरली जैसा किरदार गढ़ने की प्रेरणा दी और लॉरेंस को अमर बना दिया.
ख़ुद फ्रीदा की ज़िंदगी कैसी थी? क्या वो वाक़ई लेडी चैटरली जैसी कामुक और उन्मुक्त महिला थी?
फ्रीदा की ज़िंदगी पर नज़र डालें, तो आप को कहानी एकदम अलग ही नज़र आएगी. वो ख़ुद भले ही लॉरेंस की साहित्यिक कृतियों में दर्ज बहुत सी महिला किरदारों की प्रेरणा रही. पर, फ्रीदा की अपनी ज़िंदगी की हक़ीक़त एकदम अलग थी.
फ्रीदा वॉन रिचथोफ़ेन, डीएच लॉरेंस की प्रेमिका थी, हमराज़ थी, मॉडल थी और 'पंचिंग बैग' भी.
फ्रीदा, गुरबत के शिकार हो चुके एक जर्मन सामंत की बेटी थी. घुमक्कड़ मिज़ाज की फ्रीदा को जोखिम भरे काम करने में लुत्फ़ आता था. वो बौद्धिक प्रेरणा के लिए कसमसाती थी. पर, उस वक़्त के यूरोपीय समाज में महिलाओं को बराबरी का दर्ज़ा हासिल नहीं था.
ग़रीब बाप के घर की पाबंदियों से आज़ादी का एक ही रास्ता फ्रीदा के पास था और वो था शादी. 1899 में फ्रीदा ने केवल बीस बरस की उम्र में ब्रिटिश भाषा वैज्ञानिक अर्नेस्ट वीकले से ब्याह रचा लिया. शादी के बाद फ्रीदा जर्मनी से इंग्लैंड के नॉटिंघम शहर रहने के लिए आ गई. उस वक़्त नॉटिंघम एक औद्योगिक शहर हुआ करता था, जहां कारखानों का शोर भी था और प्रदूषण भी.
फ्रीदा ने जिस उम्मीद से शादी की थी, वो जल्द ही टूट गई. पति अर्नेस्ट वीकली को जवां बीवी से ज़्यादा काल्पनिक शब्दों में दिलचस्पी थी. फ्रीदा एक बार फिर से तन्हा थी. उसके साथ थी उसकी ख़्वाहिशें और खीझ. एक तरफ़ पति अर्नेस्ट अपनी किताब लिखने में व्यस्त, तो दूसरी तरफ़ फ्रीदा अपने तीन बच्चों को पालने में मसरूफ़.
जब पहला बच्चा सात बरस का हो गया, तो एक बार फिर फ्रीदा को अपने भीतर अजीब सी कुलबुलाहट, एक सख़्त क़िस्म की बेचैनी महसूस हुई. उसे लगा कि वो जाने क्या-क्या हो सकती थी, कर सकती थी. मगर, वो तो घरेलू ज़िम्मेदारियों की क़ैदी बन गई थी.
फ्रीदा की इस उलझन को उसकी शोख बहन एल्स वॉन रिचथोफ़ेन ने दूर किया. बहन ने फ्रीदा को नाजायज़ ताल्लुक़ात बनाने की सलाह दे डाली. फ्रीदा के मनोवैज्ञानिक ओटो ग्रॉस से अवैध संबंध बन गए. ग्रॉस, फ्रीदा का आशिक़ बन गया. पर, इस रिश्ते से भी फ्रीदा की बेचैनी दूर नहीं हुई.
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