बात 1995 की है. मुंबई में हुए सांप्रदायिक दंगों के काफ़ी दिनों बाद मणि रत्नम ने इस पर एक फ़िल्म बनाई थी जिसका नाम रख गया था, 'बॉम्बे.'
इस फ़िल्म में शिव सैनिकों को मुसलमानों को मारते और लूटते हुए दिखाया गया था. फ़िल्म के अंत में बाल ठाकरे से मिलता जुलता एक चरित्र इस हिंसा पर अपना दुख प्रकट करता दिखाई देता है. उसके साथ एक मुस्लिम नेता भी इसी तरह के विचार प्रकट करता है.
ठाकरे ने इस फ़िल्म के प्रदर्शन का विरोध किया और कहा कि वो उसे मुंबई में प्रदर्शित नहीं होने देंगे.
इस फ़िल्म के वितरक अमिताभ बच्चन ठाकरे के दोस्त थे. वो उनके पास गए और पूछा क्या शिव सैनिकों को दंगाइयों के रूप में दिखाना उन्हें बुरा लगा?
ठाकरे ने जवाब दिया, "बिल्कुल भी नहीं. मुझे जो चीज़ बुरी लगी वो था दंगों पर ठाकरे के चरित्र का दुख प्रकट करना. मैं कभी किसी चीज़ पर दुख नहीं प्रकट करता."
अपने चालीस साल से भी अधिक के राजनीतिक जीवन में कोई ऐसा विषय नहीं हुआ करता था, जिस पर ठाकरे की राय नहीं हुआ करती थी. चाहे राष्ट्रीय राजनीति हो या कला या खेल या कोई और भी विषय, बाल ठाकरे उस पर टिप्पणी करने से परहेज़ नहीं करते थे.
उनके शब्दों में अक्सर दूसरों के लिए परिहास होता था या नाक़ाबिले-बर्दाश्त तीखापन. ठाकरे के पास लोगों की परेशानी से जुड़े क़िस्सों का भंडार था.
मशहूर पत्रकार वीर साँघवी बताते हैं, "वो अक्सर एक कहानी सुनाया करते थे. एक बार रजनी पटेल की पार्टी में महाराष्ट्र के तत्कालीन क़ानून मंत्री शराब के नशे में इतने धुत हो गए कि ठाकरे ने उन्हें अपनी कार में उनके घर छोड़ने की पेशकश की. लेकिन तब तक मंत्री का अपने ऊपर नियंत्रण पूरी तरह से समाप्त हो चुका था."
"ठाकरे की कार में ही उनका पेशाब निकल गया. ठाकरे बहुत मज़े लेकर वो क़िस्सा सुनाते थे कि उनको अपनी कार से पेशाब की बदबू निकालने में महीनों लग गए. कुछ दिनों बाद वही मंत्री ओबरॉय होटल की एक पार्टी में फिर नशे में आ गए. ठाकरे ने उन्हें इस बार लिफ़्ट देने से साफ़ इंकार कर दिया."
बाल ठाकरे की जीवनी 'हिंदू हृदय सम्राट- हाऊ द शिवसेना चेंज्ड मुंबई फ़ॉर एवर' लिखने वाली सुजाता आनंदन बताती हैं, "ठाकरे के पिता केशव ठाकरे 'वेनिटी फ़ेयर' पुस्तक के अंग्रेज़ी लेखक विलियम मेकपीस ठेकरे के मुरीद हुआ करते थे. उन्होंने उनसे प्रेरणा लेकर अपना पारिवारिक नाम ठैकरे रख लिया जो बाद में बदलकर ठाकरे हो गया."
उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 'फ़्री प्रेस जर्नल' में एक कार्टूनिस्ट के तौर पर की थी, जहाँ मशहूर कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण भी उनके साथ काम किया करते थे.
दिलचस्प बात ये है कि सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी ने दो दशकों तक बाल ठाकरे का पीछे से समर्थन किया. शुरुआती दिनों में कांग्रेस ने कम्युनिस्ट आंदोलन को तोड़ने में उनकी मदद ली, बाद में उनका इस्तेमाल कांग्रेस की अंदुरूनी लड़ाइयों में हिसाब चुकता करने के लिए किया जाने लगा.
सुजाता आनंदन बताती हैं, "उन दिनों मज़ाक में शिवसेना को महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री वसंतराव नायक और वसंतदादा पाटिल के नाम पर वसंत सेना कहा जाता था."
"ये एक संयोग नहीं था कि 2007 के राष्ट्रपति चुनाव में शिव सेना ने वर्षों से अपने सहयोगी रही भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार की जगह कांग्रेस की प्रतिभा पाटिल का समर्थन करने का फ़ैसला लिया था. वर्ष 2012 में भी कांग्रेस के बिना कहे वो कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी के समर्थन में उतर आए थे."
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